उटंगन के फायदे: मूत्रकृच्छ्र, सुजाक, यकृत रोग, कफ और प्रमेह में आयुर्वेदिक उपयोग | Shirish Plant Benefits,

Sachinta maharaj

उटंगन (शिरिरी) : मूत्र रोग, सुजाक, यकृत एवं कफ रोगों की आयुर्वेदिक औषधि

उटंगन एक महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पति है जिसका उल्लेख आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा दोनों में मिलता है। इसके पत्ते, बीज और जड़ विभिन्न रोगों में उपयोगी माने जाते हैं। विशेष रूप से मूत्र संबंधी विकारों, प्रमेह, कफ रोगों तथा यकृत संबंधी समस्याओं में इसका पारंपरिक उपयोग किया जाता रहा है।


परिचय

हिन्दी: शिरिरी, चौपतिया, उटंगन, गुठवा
संस्कृत: सतिवार, स्वस्तिक, सुनिपन्नक, श्रीवार्क, शतिवार
मराठी: कुरडू
गुजराती: ओटीग, ओटीगणनाबीज
अरबी/फारसी: तुख्मे-अंजारा
तेलगु: सुनिपन्न, मनेशकामु

प्राप्ति स्थान एवं पहचान

उटंगन के पौधे प्रायः नम स्थानों, नदी किनारों और ठंडे क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इसके पत्ते चांगेरी के समान चार-चार के समूह में लगे होते हैं। इनके मध्य में फूल और बाद में फल उत्पन्न होते हैं। फलों के भीतर दो चिकने एवं चपटे बीज होते हैं जो तालमखाने के समान दिखाई देते हैं।

आयुर्वेदिक गुण

आयुर्वेद के अनुसार उटंगन के पत्तों का शाक:

  • शीतल
  • त्रिदोषनाशक
  • दीपन एवं रुचिकारक
  • हल्का एवं स्वादिष्ट
  • प्रमेह नाशक
  • श्वास रोगहर
  • ज्वरनाशक
  • भ्रम एवं त्वचा रोगों में लाभकारी

इसके बीज विशेष रूप से मूत्रकृच्छ्र (पेशाब में कठिनाई) एवं सुजाक में लाभदायक माने गए हैं।

यूनानी चिकित्सा के अनुसार गुण

  • मूत्रवर्धक
  • कामोद्दीपक
  • बल्य
  • वीर्यस्तम्भक
  • कफनिस्सारक
  • चरबी कम करने वाला
  • मासिक धर्म को नियमित करने वाला
  • गुर्दों को बल देने वाला

उटंगन के प्रमुख स्वास्थ्य लाभ

1. मूत्रकृच्छ्र (पेशाब में कठिनाई) में लाभकारी

उटंगन के बीजों का सेवन मूत्र त्याग में होने वाली कठिनाई को दूर करने में सहायक माना जाता है।

2. सुजाक एवं मूत्र रोगों में उपयोगी

पारंपरिक चिकित्सा में इसके बीजों का प्रयोग सुजाक तथा अन्य मूत्र विकारों में किया जाता रहा है।

3. प्रमेह में लाभदायक

इसके पत्तों का शाक प्रमेह रोग में उपयोगी माना गया है तथा शरीर की दुर्बलता को कम करने में सहायक हो सकता है।

4. यकृत (लिवर) एवं तिल्ली रोगों में सहायक

उटंगन के बीज और पत्ते यकृत तथा तिल्ली संबंधी विकारों में लाभकारी बताए गए हैं।

5. कफ एवं श्वास रोगों में लाभकारी

यह कफ निकालने में सहायता करता है तथा खांसी, श्वास कष्ट और गले की जलन में उपयोगी माना जाता है।

6. गुर्दों को शक्ति प्रदान करता है

उटंगन मूत्रदाह को कम करने तथा गुर्दों की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में सहायक माना जाता है।

7. वीर्यवर्धक एवं बलवर्धक

यूनानी चिकित्सा में इसके बीजों को बलदायक, वीर्यस्तम्भक और कामोद्दीपक बताया गया है।

8. अनिद्रा एवं मानसिक अशांति में सहायक

इसके पत्तों का शाक पारंपरिक रूप से निद्राजनक माना गया है, जिससे नींद बेहतर आने में सहायता मिल सकती है।

पारंपरिक उपयोग

मूत्र रुक जाने पर

उटंगन के बीज और मिश्री समान मात्रा में मिलाकर सेवन करने का उल्लेख मिलता है, जिससे मूत्र प्रवाह सामान्य होने में सहायता मिलती है।

मूत्रकृच्छ्र में

बीजों को मट्ठे के साथ पीसकर सेवन करने की परंपरा वर्णित है।

वातजन्य रोगों में

इसके पत्तों का शाक विशेष विधि से बनाकर सेवन करने का उल्लेख आयुर्वेदिक ग्रंथों में मिलता है।

सावधानी

यह जानकारी आयुर्वेदिक एवं पारंपरिक चिकित्सा ग्रंथों पर आधारित है। किसी भी रोग के उपचार के लिए योग्य आयुर्वेदाचार्य या चिकित्सक की सलाह अवश्य लें। गंभीर मूत्र रोग, यकृत रोग या अन्य चिकित्सीय स्थितियों में स्वयं उपचार न करें।

निष्कर्ष

उटंगन एक बहुगुणी औषधीय वनस्पति है, जिसका उपयोग मूत्र रोग, सुजाक, प्रमेह, कफ, श्वास रोग, यकृत विकार और शारीरिक दुर्बलता में पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है। उचित मार्गदर्शन में इसका उपयोग स्वास्थ्य लाभ प्रदान कर सकता है।

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