कटसरैया (कुरंटक) के 11 अद्भुत औषधीय लाभ | खांसी, दन्त रोग, त्वचा रोग, बुखार एवं घावों में इसके पारंपरिक उपयोग

Sachinta maharaj

कटसरैया (कुरंटक) के औषधीय लाभ, पहचान, उपयोग और आयुर्वेदिक गुण

कटसरैया (कुरंटक) की सम्पूर्ण जानकारी

कटसरैया एक महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पति है जो भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में पाई जाती है। आयुर्वेद में इसे कुरंटक, किकीरात, पीतपुष्पक, श्वेतपुण्य एवं मृदुकंट आदि नामों से जाना जाता है। इसके फूलों के रंग के आधार पर सफेद, पीले, लाल और बैंगनी रंग की विभिन्न जातियाँ पाई जाती हैं।


अन्य नाम

  • हिन्दी: कटसरैया, पीयावासा
  • संस्कृत: कुरंटक, किकीरात, पीतपुष्पक, श्वेतपुण्य, मृदुकंट
  • मराठी: कोरांटा, कलसुंदा
  • गुजराती: कंटासरियो
  • बंगाली: कंटजाति
  • तेलगू: नल्ल गोरंट

प्राप्तिस्थान

कटसरैया सम्पूर्ण भारतवर्ष में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। यह विशेष रूप से वर्षा ऋतु में अधिक मात्रा में उगता है, हालांकि कुछ क्षेत्रों में वर्षभर उपलब्ध रहता है।

कटसरैया की पहचान

  • पौधे की ऊँचाई लगभग 2 से 5 फुट तक होती है।
  • इसमें अनेक शाखाएँ निकलती हैं।
  • पत्तियाँ लंबी, नुकीली तथा 2 से 8 इंच तक लंबी होती हैं।
  • पत्तियों को मसलने पर राई जैसी तीव्र गंध आती है।
  • फूल सफेद, पीले, लाल अथवा बैंगनी रंग के हो सकते हैं।
  • फल प्रारम्भ में हरे तथा पकने पर गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं।
  • प्रत्येक फल में सामान्यतः दो बीज होते हैं।

आयुर्वेदिक गुण

सफेद फूल वाली कटसरैया

  • कड़वी एवं उष्ण प्रकृति की
  • कृमिनाशक
  • दन्त रोगों में लाभकारी
  • खाज, खुजली एवं रक्त विकारों में उपयोगी

पीले फूल वाली कटसरैया

  • भूख बढ़ाने वाली
  • कड़वी एवं कसैली
  • त्वचा और रक्त रोगों में लाभदायक

लाल फूल वाली कटसरैया

  • कान्तिवर्धक
  • रक्त विकार, शूल, श्वास एवं खांसी में उपयोगी

नीले/बैंगनी फूल वाली कटसरैया

  • सूजन कम करने वाली
  • व्रण एवं चर्म रोगों में लाभकारी
  • वात एवं कफ दोष को शांत करने वाली

कटसरैया के प्रमुख औषधीय लाभ

1. खांसी में लाभकारी

कटसरैया के पत्तों के क्वाथ में शहद मिलाकर सेवन करने से सूखी खांसी में राहत मिलती है।

2. बच्चों के अतिसार में उपयोगी

इसके काढ़े में सोंठ मिलाकर देने से बच्चों के दस्त एवं अतिसार में लाभ मिलता है।

3. प्रसूता महिलाओं के लिए लाभदायक

पीली कटसरैया का काढ़ा अथवा जड़ का रस प्रसवोत्तर समस्याओं को कम करने में पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता है।

4. घाव भरने में सहायक

इसके पत्तों की राख को घी में मिलाकर लगाने से पुराने एवं सड़े हुए घावों में लाभ मिलता है।

5. त्वचा रोगों में उपयोग

कटसरैया के पंचांग को तेल में मिलाकर लगाने से दाद, खाज, खुजली तथा अन्य त्वचा रोगों में लाभ मिलता है।

6. बुखार में लाभ

पत्तों का रस उचित मात्रा में देने से पसीना आता है, जिससे बुखार कम होने में सहायता मिलती है।

7. सर्दी-जुकाम में उपयोगी

इसके पत्तों का रस खांसी एवं सर्दी के लक्षणों को कम करने में सहायक माना जाता है।

8. बिच्छू के डंक में पारंपरिक उपयोग

लोक चिकित्सा में इसके रस का उपयोग बिच्छू के डंक से होने वाली पीड़ा को कम करने के लिए किया जाता रहा है।

9. दन्त रोगों में लाभकारी

इसके पत्तों को उबालकर कुल्ला करने से मसूड़े मजबूत होते हैं तथा हिलते हुए दांतों को लाभ मिलता है।

10. मसूड़ों से खून आना रोकने में सहायक

पारंपरिक चिकित्सा में इसका उपयोग मसूड़ों से रक्तस्राव रोकने के लिए किया जाता है।

11. त्वचा एवं रक्त विकारों में उपयोगी

कटसरैया की विभिन्न जातियाँ रक्तशोधन एवं त्वचा संबंधी विकारों में लाभकारी मानी गई हैं।

सावधानी

यह जानकारी पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथों एवं लोक चिकित्सा पर आधारित है। गर्भधारण, उपदंश, प्रसूति या किसी गंभीर रोग के उपचार हेतु किसी योग्य आयुर्वेदाचार्य या चिकित्सक की सलाह अवश्य लें। स्वयं उपचार करना उचित नहीं है।

निष्कर्ष

कटसरैया (कुरंटक) एक बहुउपयोगी औषधीय पौधा है, जिसका उपयोग आयुर्वेद में खांसी, बुखार, त्वचा रोग, दन्त रोग, घाव तथा रक्त विकारों के उपचार में किया जाता रहा है। इसके विभिन्न रंगों के फूलों वाली जातियों के गुण भी भिन्न-भिन्न बताए गए हैं, जिससे इसका औषधीय महत्व और बढ़ जाता है।


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